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तात्पर्य सेवा

भाव का बोध प्रत्येक को झकझोर देता है और हर्ष या विषाद का कारण बन जाता है। प्रारंभ से अंत तक बोध का प्रभाव रहता है, परिणाम की परिणति अंत में ही होती है।
सेवा की अवधि, जिसको हम जीवन भी मान सकते हैं, संभावना के आधार पर निश्चित होता है। संभावना और निश्चितता एवम उसका सिद्धांत हमारे आधुनिक विज्ञान की देन है।
सेवा भाव धर्म का अभिन्न हिस्सा है, जिसका किसी भी स्थिति में विभेद नहीं हो सकता और न ही होना चाहिए। विज्ञान के सिद्धांत से विभेद की स्थिति में परिणामों पर प्रभाव आज नहीं तो कल परिलक्षित अवश्य होता है।
वास्तव में सेवा भाव इकाई से अनंत तक सर्वव्यापी है। एक सूर्य का प्रभाव समस्त सृष्टि पर दृष्टिगोचर होता है। हमारे साहित्य में प्रत्येक तत्व का विवेचन है किंतु उसे प्रयोग और आचरण में हमें ही करना होगा। बूंद बूंद से ही घड़ा भरता एवम खाली भी होता है। अस्तित्व जीवन रहने तक है, जीवन समाप्त होते ही सेवा और धर्म सब विलीन हो जाता है।

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