रक्षाबंधन हमारे देश का परमपवित्र, सामाजिक और सांस्कृतिक पर्व है, जो कई संदर्भों में इतिहास से से भी जुड़ गया है। देवासुर संग्राम काल में देवराज इन्द्र की पत्नी शची द्वारा मंत्रों से संकल्पित रक्षासूत्र देवराज को बंधवाने की कथा और देवी महालक्ष्मी द्वारा राजा बलि को राखी बांधकर दोनों की रक्षा के वृत्तांत हमारे ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में विद्यमान हैं। संस्कृतिक परंपराओं में यह पर्व आदिकाल से देश और विदेश में भारतीयों में बड़े उल्लास और सौहार्द से मनाया जाता है, जिसमें सभी एक दूसरे की रक्षा का संकल्प लेते हैं। वास्तव में ऋषियों और मनीषियों द्वारा धर्म की संकल्पना ही रक्षण से प्रारंभ की गई, पुराणों के अनुसार वर्तमान मन्वंतर के आविर्भाव के समय ब्रह्मशक्ति मनु और शतरूपा की रक्षा कर धर्म की स्थापना हुई थी।
कालांतर में द्वापर युग की द्रोपदी द्वारा साड़ी का चीर श्रीकृष्ण की चोटग्रस्त उंगली पर बांधे जाने पर रक्षासूत्र मानकर श्रीकृष्ण द्वारा भविष्य में उनकी रक्षा का संकल्प इस पर्व के अनेक प्रमाण हैं, जिसका पालन इन सभी के द्वारा आजीवन किया गया। आज हम सबको यह पर्व भाई बहन तक ही सीमित न मानकर प्रत्येक नर नारी को प्रेम और सौहार्द से मनाना चाहिए।
नागरिक और समाज के संबंध चाहें वह सामाजिक, राजनैतिक, प्रशासनिक अथवा संस्थागत हों, सभी में प्रेम सौहार्द निष्ठा परायणता आदि की जिज्ञासा से स्वतः शांति और समृद्धि का समागम हो जाता है।
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर जन जन के कल्याण और प्रगति का संकल्प रूपी रक्षासूत्र धारण कर एक दूसरे को शुभकामनाएं और उपहार समर्पित करें।

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