लेख
हमारे देश का इतिहास सबसे प्राचीन है, पुरातन सभ्यता और संस्कृति के संबंध में अनेक पुरातात्विक लेख और अन्य प्रमाण इसके साक्ष्य रूप में है। इस विषय में नामकरण का इतिहास भी उस पुरातन काल तक पहुंचने में असमर्थ है, जो हमारे वैदिक साहित्य से मुखर हुआ है जिसको सनातन या सतयुग काल की संज्ञा दी गई है। प्रत्येक नर नारी समान था और किसी प्रकार का कोई विभेद नहीं था। वैदिक साहित्य में जंबू द्वीप सनातन संस्कृति का मूल क्षेत्र था। भौगोलिक एवम शासनतंत्र के आधार पर राज्य और अरण्यों का वर्णन आज भी उपलब्ध है, उदाहरणार्थ : गंधार, सिंध, हिमांचल, कौशल, आर्यावर्त, मिथिला, नैमिषारण्य, दंडकारण्य, बुंदेलखंड, विदर्भ, अयोध्या, कपिलवस्तु, श्रीलंका आदि।
इन स्थानों पर सभी सनातन संस्कृति के अनुगामी थे, जो वैदिक संस्कृति और संस्कारों को पोषक थे, जिनको हिंदू नाम से पुकारा गया इस प्रकार हमारा पुरजोर मंतव्य यही है कि वैदिक संस्कार, संस्कृति और पद्धति का अनुकरण करना ही हिंदुत्व है, जिसमें जाति, मजहब और काले गोरे का कोई भी भेद नहीं है। अनेक स्वदेशी नागरिक हिंदुत्व के नाम पर जनमानस में संशय पैदा कर रहे हैं, जो अत्यंत खेदपूर्ण है।
हिंदुत्व का मूल ही धर्म है और धर्म के द्वारा ही इस देश का नामकरण भारतवर्ष हुआ था, जिसको ब्रिटिश शासन द्वारा ही इंडिया किया गया है, जो ब्रिटिश शासन की विभेदकारी नीति थी, जिसको भारत का तत्कालीन नेतृत्व समझना ही नहीं चाहता था इसी कारण भारतवर्ष को पुनः विभाजन का जहर अपने गले में उतरना पड़ा।
प्रत्येक नागरिक को अपने देश और धर्म की रक्षा करनी ही होगी। प्रत्येक नागरिक देश का है और देश के हम रक्षक हैं और सदा रहेंगे। हम न देश से अलग होंगे और न ही अपने देशधर्म से। स्वतन्त्रता के बाद हम सभी देश की सरकार से प्रार्थना करते हैं कि इंडिया का नामकरण पुनः भारतवर्ष किया जाए, जो हमारे इतिहास की सांस्कृतिक धरोहर बनेगा।
भारत माता की जय।
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