मित्र का जीवन में विशेष महत्त्व है, समय के प्रवाह में निकट रहना स्थायित्व प्रदान करता है अन्यथा स्मृतियां ही शेष रह जाती हैं। परिस्थितियां व्यक्ति एवम उसके जीवन को प्रभावित करती रहती हैं यही समान प्रभाव मित्रता पर भी रहता है, सानिध्य जितना अधिक होता है घनिष्ठता भी उतनी अधिक होती है और यही घनिष्ठता मित्र की पहचान है।
मित्र में एक दूसरे के सुख दुःख का सदा ज्ञान होता है एवम ऐसे अवसरों में स्वयं समर्पित रहते हैं। उचित अनुचित के बोध, समाधान और उन्नयन में मित्र या सहचर ही अधिकांश सहायक होता है। भारतीय साहित्य में हनुमान सुग्रीव, सुदामा कृष्ण अर्जुन कर्ण और घटोत्कच आदि अनेक दृष्टांत हैं।
वैदिक साहित्य में सृष्टि के कल्याणकारी सभी तत्वों को मित्र की ही संज्ञा दी गई है, मित्र अभिन्न मन है।
पीएमबी लेखक – के पी गुप्ता
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