श्रमिक या मजदूर का पारिश्रमिक ही उसकी जीविका है। मोहन एक परिश्रमी कृषक का बेटा और कक्षा 9 का विद्यार्थी था, जो नित्य विद्यालय जाता एवम अतिरिक्त समय में अध्ययन के साथ ही अपने पिताजी के कृषि कार्यों में सहायता भी करता था। विद्यालय के एक सहपाठी अंचल से उसकी घनिष्ट मित्रता थी। पठन पाठन एवम कक्षाकार्य में दोनों ही गुरुजनों को प्रिय थे। दोनों साथ ही साथ उच्चतर माध्यमिक और दूसरे महाविद्यालय से स्नातक परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। अब दोनों अपने रोजगार की चिंता में भी थे अतः साथ साथ प्रयास भी करते। सौभाग्य से वर्ष भर में अंचल को सरकारी विभाग में पर्यवेक्षक पद पर नियुक्ति मिल गई और वे दोनों अलग अलग हो गए। पत्राचार के माध्यम से कुछ वर्ष तारतम्य बना रहा किंतु दायित्वों की व्यस्ततावश सम्पर्क टूट गया।
मोहन भी बी.एड. का प्रशिक्षण पूरा कर एक विद्यालय में अध्यापन रत हो गया। मोहन के बाहर जाते ही उसके माता पिता पर घर और खेत खलिहानों का दायित्व बढ़ गया। मोहन ने प्रयास किया कि वे भी उसके साथ ही प्रवास करें किंतु यह संभव न हो सका। मोहन के पिताजी की दुर्बलता बढ़ती जा रही थी, अंततः परिवार को दुर्भाग्य की मार सहनी ही पड़ी।
अब मोहन मां जी को अकेला नहीं छोड़ना चाहता था अतः विरोध के बाद भी उन्हें वह साथ ले गया, जहां वह कार्यरत है, जीविका का साधन कृषि से शिक्षण सेवा में परिवर्तित हो गया, जो अपेक्षाकृत अधिक कल्याणकारी और व्यापक है। मोहन की सेवानिवृत्ति के बाद मां ने पुनः समझाया कि श्रम का पारिश्रमिक जीविका ही है, जीवन है तो जीविका भी है अन्यथा सब व्यर्थ है।

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